*जयमाला की बेला*

याद आई मुझे वो घड़ी
मेरी बहन की शादी थी
बुआ की वो प्यारी लाडली थी
मैं गई थी थोड़ा देर से ही
जाकर जल्दी तैयार हुई
जयमाला की बेला थी
सारी बहनों को संग में जाना था
मैं कोने में छुपकर बैठी
मुझको संग ना जाना था
सब चली गईं मुझे ढूंढ-ढूंढकर
मैं छिपकर कोने में बैठी रही
हो गया जब जयमाल तो
मैं कोने से निकल पड़ी
फिर पकड़ लिया सबने मुझको
खींचकर जबरन ले गईं वहाँ
फोटो खिंचवाकर
मैं खिसक गई
छुप गई नहीं था कोई जहाँ
फिर दीदी का देवर दीवाना
पहुंच गया मुझे ढूंढते हुए
मैं उसी से थी छिप रही अभी तक
वो पहुंच गया मुझे सूंघते हुए
वो बोला मुझसे कैसी हो ??
मैंने चाँद की तरफ इशारा किया
फिर बोला तुम कुछ बोलो ना
मैंने भाई बोल दिया
जब चलने लगी वहाँ से मैं तो
पकड़ ली उसने मेरी चूनर
बोला तेरा दीवाना हूँ
भाई ना हूँ मैं
तेरा शौहर !
फिर क्या था मुझको गुस्सा आया
खींचकर मारे मैंने दो-चार थप्पड़
हल्का-सा भूचाल आया
वो मजनू फिर ना मुझे दिखा
दीदी भी हो गईं विदा….

Comments

10 responses to “*जयमाला की बेला*”

  1. Geeta kumari

    हा हा बहुत लाजवाब

    1. धन्यवाद दी

  2. हा हा हा हा हा हा हा
    लाजवाब 🙂👌✍✍

    1. धन्यवाद rishi

  3. Rajeev Ranjan Avatar
    Rajeev Ranjan

    दबाई गई चिंगारी अक्सर
    ज्वालामुखी बन जाती है
    छिप छिपकर टालते जाना
    अन्यायी का हौसला बढ़ाती है

    1. धन्यवाद आपका

  4. Rajeev Ranjan Avatar
    Rajeev Ranjan

    आपका भी

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