जलधार..

चढ़ा आषाढ़ श्याम घन घिर आए,
आ कर खूब नीर बरसाए।
किसी अपने के बिछोह में,
नैन नीर मेरे भी आए।
ऑंचल भीगा, नयन भी भीगे,
यादें आईं अपार।
इधर मेरे नैना बरसे,
उधर गिरी जलधार॥
____, ✍गीता

Comments

4 responses to “जलधार..”

  1. बहुत ही सुंदर

    1. धन्यवाद एकता

  2. हृदय के भावों से सरोबार रचना

    1. बहुत-बहुत आभार सतीश जी

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