जल

जल तु इतना कोमल फिर कठोर क्यों
तुम जीवन-रक्षक फिर प्राण-हरता क्यों
तुम बहते सरल फिर तीव्र रूप क्यों
तुम मीठी-प्यास फिर नमकीन क्यों
यह गुस्से में नीला आसमान क्यों
जलमग्न धरती थर-थर कांपे क्यों
इन्सान खुद ही प्रकृति का विनाश कर पूछें क्यों
खुदगर्ज इन्सान अपने बिछाऐ जाल फंस अब रोए क्यों
प्रकृति को प्यार कर, सहेज ले, यह और नहीं कुछ चाहती
अवसर अभी बाकी है
तपता सूरज, चाँदनी रातें, महकती हवाएँ,
अभी गंगा में बहती जलधारा बाकी है।

Comments

8 responses to “जल”

  1. मोहन सिंह मानुष Avatar
    मोहन सिंह मानुष

    बहुत ही सराहनीय प्रस्तुति

    1. Anu Singla

      शुक्रिया जी

    1. Anu Singla

      धन्यवाद

  2. Anu Singla

    धन्यवाद

  3. सुंदर रचना

    1. शुक्रिया

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