ज़िन्दगी के इस खेल में

तेरी परछाई को देख लेता हूँ
चेहरे को देखने का मौका कहाँ मिलता।
ज़िन्दगी के इस खेल में
दौड़-दौड़ दौड़ लेता हूँ चौका कहाँ मिलता।।

Comments

6 responses to “ज़िन्दगी के इस खेल में”

  1. बहुत बहुत शानदार लिखा है शास्त्री जी, वाह वाह
    तेरी परछाई को देख लेता हूँ
    चेहरे को देखने का मौका कहाँ ,
    काबिलेतारीफ पंक्तियाँ

    1. बहुत बहुत धन्यवाद पाण्डेयजी
      अगली पंक्ति पर भी गौर फरमाईए

  2. बहुत खूब भाई जी लाजवाब अभिव्यक्ति

  3. Sandeep Kala

    अतिसुंदर

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