ज़िन्दगी मोबाइल की गुलाम हो गई..

ज़िन्दगी “मोबाइल” की गुलाम हो गई ,
“मोबाइल” के संग ही सुबह और शाम हो गई
लिखना हो तो मोबाइल, पढ़ना हो तो मोबाइल,
अब ये बातें तो आम हो गईं
मिलने के भी मोहताज ना रहे ,
“मोबाइल” से ही बातें तमाम हो गई
मोबाइल में मन लगता है सभी का,
आधी ज़िन्दगी इसी के नाम हो गई..

*****✍️गीता*****

Comments

11 responses to “ज़िन्दगी मोबाइल की गुलाम हो गई..”

  1. वाह क्या बात है, बहुत ही सुंदर कविता, समसामयिक रचना, जो हो रहा है, उसे प्रकट करती हुई बेहतरीन रचना।

    1. Geeta kumari

      आपकी इस बहुमूल्य समीक्षा के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद सतीश जी
      आपका अभिवादन 🙏

  2. वाह वाह क्या बात है, शानदार कविता

    1. Geeta kumari

      बहुत बहुत धन्यवाद आपका पीयूष जी 🙏

  3. वाह वाह बहुत खूब

    1. Geeta kumari

      शुक्रिया भाई जी 🙏

  4. बहुत ही बढ़िया, waah waah,

    1. Geeta kumari

      बहुत बहुत धन्यवाद आपका सर 🙏

  5. बहुत सुंदर कविता

    1. Geeta kumari

      बहुत बहुत धन्यवाद आपका जोशी जी 🙏

  6. Very nice गीता जी

Leave a Reply

New Report

Close