जाड़ा का मौसम बड़ा सुहाना।
भाँति -भाँति के बनते खाना।।
गाजर का हलुआ सबको प्यारा।
खाओ मूंगफली भगाओ जाड़ा।।
गाजर शलग़म मूली का अचार।
बड़े स्वाद लेकर खाए सब यार।।
आंवले को खा पानी पीना।
मूंह का मीठा -मीठा होना।।
च्यवनप्राश भी खाने को मिलते।
गेंदा गुलाब के फूल भी खिलते।।
ताजे -ताजे गुड़ भी घर में।
घच्चक रेवड़ी सजा शहर में।।
ऐसा सुंदर शरद है काल ।
हम बच्चे हो गए निहाल।।
*************बाकलम********
बालकवि पुनीतकुमार ‘ ऋषि ‘
बस्सी पठाना (पंजाब)
जाड़ा का मौसम
Comments
4 responses to “जाड़ा का मौसम”
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बाल कवि पुनीत कुमार की बहुत उम्दा रचना, जिसमें उन्होंने मौसमी फ़ल फ़ूल और सब्ज़ियों कि उपयोगिता और स्वाद के बारे में जानकारी दी है। बहुत सुंदर कविता है। लेखन यूं ही चलता रहे
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धन्यवाद बहिन
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बाल कवि पुनीत ने ठंडक के मौसम में बनने वाले व्यंजनों , फल-फूल एवं खाद्य पदार्थों पर लेखनी चलाकर यह कविता प्रस्तुत की है जो कि बहुत ही सुंदर और सराहनीय है। यूँ ही निरंतर लेखनी चलती रहे। खूब आगे बढ़ें। बहुत सुंदर लिखा है वाह।
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बहुत बहुत धन्यवाद पाण्डेयजी
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