जिसे जिंदगी कहते हैं
कितनी उधेड़बुन करती हूं,
मैं इन धागों के साथ ।
जिसे जिंदगी कहते हैं ,
कभी गम की गांठ खोलती हूं।
कभी खुशियों की गांठ बांधती हूं ।
बस लगी रहती हूं ,इसे सुलझाने में।
कितनी उधेड़बुन करती हूं,
मैं इन धागों के साथ।
जिसे जिंदगी कहते हैं।
सुंदर
धन्यवाद सर
क्या बात है
धन्यवाद जी
सुख-दुख का आना स्वाभाविक बात है मगर जिंदगी के साथ संघर्ष करना बहुत बड़ी बात ।
सुंदर भाव
बेहतरीन पंक्तियां
धन्यवाद जी
सुन्दर समीक्षा के लिए हार्दिक धन्यवाद
very nice
Thank you