जि़न्दगी की ओर

मैं अर्धविक्षिप्त अवस्था में थी,
निकाल कर ला रही हूँ धीरे-धीरे स्वयं को ।
मेरे पाॅंव में डाली हुई आपकी नेह की डोर,
लेकर आ रही है मुझे जिंदगी की ओर।
आपके नेह का ऑंचल सदा,
करता रहा रक्षा मेरी।
भेजी थी जो आपने मेरे लिए दुआएँ सभी,
वो मिल रही हैं मुझ को,
दे रही हैं बल वापिस लौटने का।
हाथ बढ़ाकर छू लूॅंगी जिंदगी को,
यह वादा है मेरा।
दो कदम कठिन है मगर,
मैं करूॅंगी पार, धीरे ही सही,
आऊंगी लौटकर ,
आपकी नेह की पकड़ कर डोर,
ऐ, जिंदगी तेरी ओर
ऐ, रौशनी तेरी ओर॥
_____✍गीता

Comments

5 responses to “जि़न्दगी की ओर”

  1. vikash kumar

    Great l

  2. Anu Singla

    बहुत सुन्दर भाव, आपका इंतजार है सावन को।

  3. Amita

    आपको सदैव सभी से स्नेह मिलता रहे,
    आपकी रचनाओं का इंतजार है हमें।

  4. Ekta

    आपकी जिंदगी में यूं ही रौशनी उजाला करती रहे
    दो कदम कठिन है मगर ,जिंदगी की ओर कदम बढ़ाती रहे
    लिखकर अपनी सुंदर सुंदर सी रचनाएं
    हम सबको काव्यरस का पान कराती रहें

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