जय श्री सीताराम
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जीना जरूरी है,
मरना कायरों का काम है .
प्रण का टूटना स्वाभाविक है,
फिर भी उठना वीरों का काम है .।।1।।
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आलस मन और सुस्त तन उसका है,
जिसने खूद पे वार किया, संहार किया.
मगर समझा न खूद को,
उसका समस्त जीवन बेकार है ।।2।।
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ऐसे ही नहीं योगी,
धरा पे स्वछंद विचरते है.
जप-तप उनका भोजन है,
हरि-नाम उनका जीवन है ।।3।।
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लूटा दो जिन्दगी नर सत्-पथ पे,
कुमार्ग पे क्या रखा है ?
चहूँ और अँधियारा है,
प्रकाश तो केवल खूद में है ।।4।।
(प्रकाश तो स्वयं की वस्तु है ।।)
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हाँ प्रकाश तो केवल खूद में है,
प्रकाश ही संकल्प कराता है,
नर को संकल्प की डोर में बँधना है,
और मानव-जीवन सरल बनाना है ।।5।।
जय श्री सीताराम
जीना जरूरी है
Comments
2 responses to “जीना जरूरी है”
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ऐसे ही नहीं योगी,
धरा पे स्वछंद विचरते है.
जप-तप उनका भोजन है,
हरि-नाम उनका जीवन है ।।3।।
__________ योगी जीवन के बारे में जानकारी देते हुए और सत् मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती हुई कवि विकास जी की बहुत श्रेष्ठ रचना जय श्री राम -
खूव
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