जय श्री सीताराम
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दुनिया लूटी अपनी करतुत से
मैं लूटा अपनी विचार से
कोई लूटे तो लूटे, अपनी करतूत से
पर कोई ना लूटे, अपनी संस्कार से ।। (प्रवाह)
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सब खेले होली खुद के संग में,
कोई हँसे ना अपनी हस्त की लकीर पे.
सब रंग रचते है दाता इस लोक में,
और सब रंगों में भिंगते हैं,
नर और मादा इस भुवन में ।।1।।
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ऐसी होली ना हो रब तेरे इस जग में,
कि कोई हँसे तो कोई रोये तेरे दर पे
सब मगन रहे खूद में,
और सब बात करे, एक-दूसरे से ।।2।।
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मैं लौटा हूँ अगर रब तेरे दरबार से
पर कोई ना लौटे रब तेरे दर से
मुझे भी अपनी शरण में ले लो नाथ
नहीं तो किस-किस दर पे भटकेंगे हम रघुनाथ ।।3।।
——————-जय श्री सीताराम ।।
सब खेले होली खुद के संग में,
Comments
2 responses to “सब खेले होली खुद के संग में,”
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मैं लौटा हूँ अगर रब तेरे दरबार से
पर कोई ना लौटे रब तेरे दर से
_________ प्रभु पर अपनी आस्था व्यक्त करते हुए कवि विकास जी की बहुत सुंदर रचना । जय श्री राम -
वाह
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