झूठ की दुकान

झूठ की दुकान खूब चली,
“सच”, सच बोलता रहा
उसकी ना चलनी थी, ना चली,
पर ये ज्यादा लंबा चलने वाला ना था
काठ की हांडी में एक बार तो पका लिया,
फिर दोबारा चढ़ी, जलनी ही थी सो जली।
सच्चाई तो फिर सच्चाई है,
एक ना एक दिन लगेगी भली
झूठ को देखो, घूमे है गली गली।
✍️.. गीता

Comments

11 responses to “झूठ की दुकान”

  1. मैडम गली-गली के बीच
    योजक चिन्ह का प्रयोग होना चाहिए था।
    सत्य ही टिकता है झूँठ की उम्र लम्बी नहीं होती।
    सत्य बोलने के प्रति जागरूक करती हुई रचना।

    1. Geeta kumari

      धन्यवाद जी🙏

      1. वेलकम

  2. Satish Pandey

    बहुत ही सुन्दर तरीके से सच झूठ का विश्लेषण किया है, वाह गीता जी

    1. Geeta kumari

      बहुत बहुत धन्यवाद सतीश जी 🙏

  3. Antariksha Saha Avatar
    Antariksha Saha

    मुझे बहुत अच्छी lagi

    1. Geeta kumari

      आपका बहुत बहुत धन्यवाद 🙏

  4. Devi Kamla

    Very nice

    1. Geeta kumari

      Thank you Kamla ji 🙏

  5. Piyush Joshi

    Bahut khoob kavita

    1. Geeta kumari

      Thanks Allot Piyush ji 🙏

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