ठंड में मैं आग पीना चाहता हूँ

मैं कभी तो खूब रोना चाहता हूँ,
ठंड में मैं आग पीना चाहता हूँ,
रात भर अकड़ा हुआ बेजान मत समझो,
अभी तो और जीना चाहता हूँ।
पैदा हुआ कैसे कहाँ कब क्या
न जाने,
बस इसी फुटपाथ को पहचानता हूँ।
माँ-बाप क्या परिवार क्या है क्या पता,
मैं अकेली रात को ही जानता हूँ।
कौन कब मुझको यहां पर रख गया,
कौन हूँ खुद भी नहीं पहचानता हूँ।
मैं कभी तो खूब रोना चाहता हूँ,
ठंड में मैं आग पीना चाहता हूँ,

Comments

8 responses to “ठंड में मैं आग पीना चाहता हूँ”

  1. बहुत ही बेहतरीन पंक्तियाँ

  2. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    बहुत खूब
    अनाथों की ज़िन्दगी का यथार्थ चित्रण

  3. बहुत खूब बहुत बढ़िया

  4. Geeta kumari

    अनाथ बच्चे की तन्हा ज़िन्दगी का और ज़िन्दगी से जूझने का वास्तविक चित्रण । बहुत ही मार्मिक अभिव्यक्ति

  5. लाजबाब सर

  6. Suman Kumari

    बेहतरीन

  7. बेसहारा अनाथ बच्चे की कहानी बयां करती मार्मिक रचना

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