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  1. “ठंड हो जिस समय जिन्दगी में उस समय ओढ़ना बन सकूँ,
    जब कभी बन्द हो जाये रसना उस समय बोलना बन सकूँ।”
    मित्रता के बारे में कवि के बहुत ही सुन्दर विचार हैं,किन्तु मेरे विचार हैं कि मित्रता स्वार्थ से परे ही होती है , मित्रता को सिद्ध करना पड़े तो कैसी मित्रता । मित्र तो मित्र के सुख, दुख स्वयं ही समझ लेते हैं। बहुत सुन्दर रचना

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