डर

सिमट रहा हूं धीरे धीरे

इन सर्द रातों में

छिपा रहा हूं खुद को खुद में

इस बेनूर अंधेरे में

कभी कोई चीख सुनाई देती है

खामोश सी,

कभी सर्द हवाओं को चीरती पत्तों की सरसराहट,

तो कभी कहीं दूर भागती गाडी की आवाज

कभी कभी गिर पडते हैं

ठण्डेठण्डे रूखसारों पर गर्म आंसू,

कभी चल उठती है

यादों की लपटें सर्द हवाओं के बीच,

कभी डर उठता हूं पास आती अनजान आहटों से

देखता हूं बार बार बाहर बंद खिडकी से झांककर

कहीं कोई बाहर तो नहीं?

नहीं, कोई नहीं बस डर है

शायद अजीब सा

समझ नहीं आता कैसा

किसी के साथ होने का डर या,

किसी साथ जाने का ?

Comments

4 responses to “डर”

  1. राम नरेशपुरवाला

    Good

  2. Satish Pandey

    वाह वाह

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