तनहाइयाँ

दिल के दर्द को कैसे तुम्हें समझाएँ,
हैं बहुत तनहा, यह कैसे तुम्हें बताऍं।
साॅंझ, सवेरे सूरज की लाली है,
मगर दिल उमंगों से खाली है।
रातों को तारे जब टिमटिमाते हैं,
मेरी आँखों के ऑंसू भी झिलमिलाते हैं।
चाॅंद भी मौन सा निहारे मुझको,
आ बैठ पास दर्द दिखा दूॅं तुझको।
सुकून के पल अब नहीं मिल पाते हैं,
ये तो गुज़रे ज़माने की बातें हैं।
दिल के दर्द को कैसे समझाऊँ,
हूँ बहुत तनहा यह कैसे बताऊँ॥
______✍गीता

Comments

4 responses to “तनहाइयाँ”

  1. बहुत सच्ची और मार्मिक प्रस्तुति है, रचना में  गहरी वेदना है। 

    1. बहुत-बहुत धन्यवाद सतीश जी

  2. बहुत सुन्दर रचना

    1. बहुत बहुत धन्यवाद चन्द्रा जी

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