जिम्मेदारी के बोझ तले
दबा रहता है जीवन
जाने किन खयालों में
खोया रहता है जीवन
उठकर तलाशती हूँ मैं जमीं अपनी
आसमां जाने क्या
ढूंढा करता है जीवन…
‘तलाशती हूँ मैं जमीं अपनी’
Comments
9 responses to “‘तलाशती हूँ मैं जमीं अपनी’”
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अतिसुंदर भाव
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Tq
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आपकी सोच उच्च कोटि का है। कविता में भाव कूट कूट के भरी पड़ी है।
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धन्यवाद सर आपका
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आसमां में’ पढ़ें
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धन्यवाद
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पता नहीं
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