तस्वीर-ए-खूबसूरती

मन ही मन मैं एक,
‘तस्वीर-ए-खूबसूरती’ बनाया करती हूं।
वक्त की रफ्तार बढ़ती जाए,
और मैं सब्र के घूंट भरती हूं।

रोज उगते सूरज के साथ,
उम्मीद की किरण बनाती हूं।
रंगो के बागीचे में,
मैं उस तस्वीर के लिए रंगना चाहती हूं।

बैठ उस शजर-ए-उम्मीद की छाओ में,
सपने मैं तारीफ की ऊन से बुनती हूं।
डाली पर बैठे परिन्दों की आवाज में,
उस तस्वीर के बोल मैं सुनती हूं।

बारिश की धुन में,
उसको आनंद लेते देखती हूं।
चांद के पूछने पर,
उस तस्वीर को मैं ‘कुदरत’ का नाम देती हूं।

Comments

Leave a Reply

New Report

Close