मुझे यह बताते हुए हर्ष होता है की यह कविता मेरी पहली कविता थी जो मैंने दिनांक 22-11-2010 को लिखी थी
आशा करता हूं कि आप सब लोगों को भी यह पसंद आएगी ।
जब तुम थे मिले
बहार आ गई थी जिंदगी में
सुबह की पहली किरण भी
हमसे मिलकर जाती थी
पंछी हमें देख गाते थे
झरने हमें देख झरते थे
अपने अलग अंदाज में
क्योंकि
तब तुम भी साथ थे
रास्ते की धूल
लिपट जाती थी पैरों से हमारे
जैसे रोक रही हो हमें दूर जाने से
देवदार के गगनचुंबी पेड़
हमारी राह तकते थे
तरसते थे, हमें अपनी छांव बिठाने के लिए
इन सब को इंतजार था हमारा
क्योंकि
तब तुम साथ थे
शाम के समय
बहती हुई वो ठंडी बयार
काली नदी* का शांत बहता जल
ठंडी पड़ी हुई नरम रेत
गंगेश्वर बाबा का मंदिर और उसके सामने दूब घास
वह एहसास ही कुछ अलग था
क्योंकि
तब तुम साथ थे
चांदनी रात में
आँगन से खाट में बैठकर
तारों से घिरा चांद
हमसे मीठी-मीठी बातें करता था
उसकी दूधिया शीतल रोशनी में
डूबी हुई बगोटी*
अच्छी लगती थी
क्योंकि
तब तुम साथ थे
आज जब मैं सुबह उठा
सब कुछ बदल गया था
सूरज की किरणे
अपना प्रकाश फैला चुकी थी
“बिना हमसे मिले”
पंछी व झरने शांत थे
मौसम बदल चुका था
क्योंकि
अब तुम साथ न थे
रास्ते की धूल
पैरों से चिपकने से डर रही थी
जैसे मैं अछूत हो गया हूं
पेड़ भी अपना मुंह फेर रहे थे
अपनी छांव का बिछौना समेट रहे थे
जैसे गांव से पलायन कर रहे हो
सब हमसे रूठ गए थे
क्योंकि
अब तुम साथ न थे
शाम के समय
ठंडी बयार चुभ रही थी
कांटों की तरह
काली नदी* का शांत जल
आज गुस्से में उफान पर था
गर्म रेत अजनबी सा बर्ताव कर रही थी
जैसे उलाहना दे रही हो मेरे स्पर्श पर
क्योंकि
अब तुम साथ न थे
उस रात में
आसमान में अंधेरा था
चांद की रोशनी, तारों से भी कम थी पूरी बगोटी* में अंधेरा था
शायद आज अमावस है
लेकिन मुझे इंतजार है उस रात का जब फिर पूर्णिमा होगी
क्योंकि
तब तुम फिर साथ होगे
*बगोटी – उत्तराखंड का एक गांव(मेरा गांव)
*काली नदी – उत्तराखंड की एक नदी जो भारत तथा नेपाल के बीच अंतर्राष्ट्रीय सीमा बनाती है।
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