तुम्हारे हुस्न के मुट्ठीगंज में फंसकर

तुम्हारे हुस्न के मुट्ठीगंज में फंसकर
इश्क़ अरैल घाट में डूब जाता है।
दिल धड़कता था सिविल लाइन सा,
अब यादों का कंपनी बाग बन जाता है।।

~सुरेंद्र जायसवाल (प्रतापगढ़)

Comments

5 responses to “तुम्हारे हुस्न के मुट्ठीगंज में फंसकर”

  1. Sulekha yadav Avatar

    बहुत खूब..उपमायें सुन्दर हैं

  2. Satish Pandey

    “मुट्ठीगंज” ” कंपनी बाग” और “सिविल लाइन” जैसे उपमानों के प्रयोग ने नवीनता के साथ साथ खूबसूरती का संचार किया है, वाह क्या कहने

  3. उपमा अलंकार का सुंदर प्रयोग किया

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