तेरे लिए

गुम कर दिया तेरे प्यार में
पर फिर भी यही सवाल रहा
क्या करती हो मेरे लिए।
छोङ दिया अपनी पसंद
भूल गयी क्या था नापसंद
भुला बैठी खुद के अस्तित्व को
फिर भी सवाल मुंह बाए खड़ा
करती क्या मेरे लिए।
छोङ दिया अपनी पसंद
भूल गयी क्या था नापसंद
भुला बैठी खुद के अस्तित्व को
फिर भी सवाल मुंह बाए खड़ा
करती क्या मेरे लिए।
बाजार में, अचानक आई वारिश में
भींग गयी, खो गई उन बिछङी ख्यालों में
कागज़ की कश्ती पानी में बहाना
कहां आता मुझे, अब कागज़ की नाव बनाना
आकांक्षाओं को जिम्मेदारियों में दफना के
रह गयी तेरी होके लाए‌ जब अर्द्धांगिनी बनाके
जीते जी मर जाती हूं, कहते हो जब
करती क्या मेरे लिए।
तुम्हारे घर को अपना लिया,
पहचान तुमसे बना जो लिया,
भुला पाई अपने उस रात मात को
तुझे सौंप,पुन्य जिसने कमा लिया
उनकी परेशानी, उनकी बीमारी से
बेचैन हो उठती हूं, अपनी लाचारी से
सक्षम होके,अक्षमता के लिवास में लिपटी हुई
कर पाती नहीं ,सारे अधिकार हूं बिसरी हुई
सिर्फ दुआओं का है आसरा, फिर कहते हो क्यूं करती क्या मेरे लिए।

Comments

2 responses to “तेरे लिए”

  1. प्रेम रस की बरसात हो रही है। 

  2. बहुत सुन्दर

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