थोड़ी इंसानियत कमानी है

जिन्दगी में कमाते रहते हैं
खूब रूतबा, व खूब पैसे हम
जमा पूँजी को गिनते रहते हैं
जमा में और जमा करते हैं।
जोड़ने का नहीं है अन्त कोई,
लालसा का नहीं है अन्त कोई,
बस मिले, मिलता रहे, खूब मिले
पेट ठुंस ठुंस के भरे, भरता रहे।
भूल जाते हैं हम जमीं पर हैं
एक दिन ये भी छोड़ जानी है,
थोड़ा ईमान भी कमाना है
थोड़ी इंसानियत कमानी है।
ये जो संग्रह किया है दौलत का
अंत में काम नहीं आना है,
मान-रुतबा यहीं रहेगा सब,
साथ सद्कर्म को ही जाना है।
—- सतीश चन्द्र पाण्डेय

Comments

12 responses to “थोड़ी इंसानियत कमानी है”

  1. अति सुन्दर, वाह

    1. Satish Pandey

      Thanks

  2. बिल्कुल सही कहा..
    थोड़ी इंसानियत कमानी है क्योंकि पैसा कमाते कमाते हम लोग मानवता ही भूल गये हैं

    1. Satish Pandey

      बहुत बहुत धन्यवाद

    1. Satish Pandey

      Thanks

  3. Geeta kumari

    “मान-रुतबा यहीं रहेगा सब,साथ सद्कर्म को ही जाना है।”
    लालची लोगों को आइना दिखाती हुई कवि की बहुत ही प्रेरक रचना
    साधुवाद

    1. Satish Pandey

      इस सुन्दर समीक्षगत टिप्पणी हेतु हार्दिक धन्यवाद

  4. शानदार लिखा है

    1. Satish Pandey

      बहुत बहुत धन्यवाद

    1. Satish Pandey

      सादर धन्यवाद

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