दिल मांगे मोर..

एक पति थे,
थोड़े बोर टाइप
और पत्नी थी उनकी,
दिल मांगे मोर टाइप
कोरोना काल में,
ना कामवाली आती
ना सहेलियों से मिल पाती,
पति से पूछती रहती बेचारी,
कैसी लगती है,बताओ तो आपको ये नारी
पति कभी कुछ बोल देते,
कभी चुपचाप ही निहारते रहते
एक दिन क्या हुआ….
रसोई में गई,चाकू उठाया
कलाई की नस पे लगाया,
और बोली…………..
तारीफ़ करते हो, या काट दूं …

*****✍️गीता

Comments

12 responses to “दिल मांगे मोर..”

  1. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    प्यारी सी धमकी
    रजिस्टर्ड प्यार
    दिल मांगे मोर ,पर
    इमोशनल अत्याचार =अतिसुंदर ठहाका

    1. Geeta kumari

      आपका ठहाका ही मेरी समीक्षा हुई भाई जी ।🙏Thank you very much .

  2. Satish Pandey

    बहुत सुन्दर हास्य रचना। श्रृंगारमयी चुहलबाजियों का बहुत ही सुंदर चित्रण। कथात्मक शैली में कवि गीता जी ने बेहतरीन हास्य कविता का सृजन किया है।
    रसोई में गई,चाकू उठाया
    कलाई की नस पे लगाया,
    और बोली…………..
    तारीफ़ करते हो, या काट दूं …
    हा हा हा, क्या प्रस्तुति है,

    1. Geeta kumari

      बहुत सारा धन्यवाद सतीश जी आपकी यही हंसी आज की बेहतरीन समीक्षा है ।”हास्य कविता”, …ये लिखे बिना ही आपको हंसी आई बहुत अच्छा लगा ।सुंदर समीक्षा के लिए बहुत बहुत शुक्रिया ..

  3. Rishi Kumar

    नारी शक्ति जिंदाबाद😀😀✍👌

    1. Geeta kumari

      बहुत बहुत धन्यवाद ऋषि जी ।नारी शक्ति के जिंदाबाद के लिए अतिरिक्त आभार ।

  4. हा हा हा, बहुत खूब

    1. Geeta kumari

      आज तो आपकी हंसी ही मेरी समीक्षा है कमला जी बहुत बहुत धन्यवाद
      आप ऐसे ही हंसती रहें ।

  5. हा हा हा, कमाल है

    1. Geeta kumari

      मेरी कविता पर आपकी हंसी के लिए बहुत बहुत धन्यवाद पीयूष जी 🙏

  6. बेहद खूबसूरती वाली हास्य रचना

    1. Geeta kumari

      बहुत बहुत धन्यवाद प्रज्ञा

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