दीप मोहब्बत के जलते रहे

स्वप्न पलकों पर सुहाने सजते रहे,
दीप मोहब्बत के जलते रहे।
धड़कन भी गीत गुनगुनाने लगी,
सांसे भी कविता सुनाने लगीं।
पायल के घुंघरू सरगम बजाने लगे,
कलाई के कंगन गीत गाने लगे,
धानी चुनर हवा में लहराने लगी,
पवन में तेरी ख़ुशबू मुझे आने लगी।।
______✍️गीता

Comments

7 responses to “दीप मोहब्बत के जलते रहे”

  1. MS Lohaghat

    स्वप्न पलकों पर सुहाने सजते रहे,
    दीप मोहब्बत के जलते रहे।
    धड़कन भी गीत गुनगुनाने लगी,
    सांसे भी कविता सुनाने लगीं।
    ——- कवि गीता जी की बहुत लाजवाब रचना है यह। बहुत खूब

    1. Geeta kumari

      सुंदर समीक्षा हेतु बहुत-बहुत आभार सर 🙏

  2. Satish Pandey

    धानी चुनर हवा में लहराने लगी,
    पवन में तेरी ख़ुशबू मुझे आने लगी।
    –––// कवि गीता जी की बेहतरीन रचना, भाषा व भाव दोनों ही अति सुंदर

    1. Geeta kumari

      सुंदर और प्रेरक समीक्षा हेतु हार्दिक धन्यवाद सतीश जी। बहुत-बहुत आभार सर

      1. This comment is currently unavailable

    1. Geeta kumari

      शुक्रिया भाई जी 🙏

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