दुनियाँ

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निष्ठा सच ईमानदारी से लड़ लड़ जूझ रही दुनियाँ।
जो पारंगत षड़यंत्रों में उनको पूज रही दुनियाँ।।

कम से कम प्रयास करके भी जमना चाहें चोटी पर।
शोध कर रहे मिलकर प्यादे शह मातों की गोटी पर।
चाटुकारिता सरल पहेली सबको बूझ रही दुनियाँ।।

भिन्न भिन्न है कथनी करनी हरिश्चन्द्र का बाना है।
जिनकी छद्मवेश प्रतिभा का सीमित नहीं खजाना है।
कर्ण कर्ण में उनकी तूती बनकर गूँज रही दुनियाँ।।

धर्मराज को दुर्योधन में श्रीनारायण दिखते हैं।
दुर्योधन को नारायण भी पाप परायण दिखते हैं।
दुष्कर्मी को अपने जैसी पापिन सूझ रही दुनियाँ।।

नये दौर में जाने क्या क्या भाव घुसे हैं भेजे में।
जल चुकती बस्ती, पड़ती है ठंडक तभी कलेजे में।
बैर भाव की आग लगाकर भाजी भूंज रही दुनियाँ।।

संजय नारायण

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One response to “दुनियाँ”

  1. यथार्थ परक रचना

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