जब-जब मेरी कलम चले,
ऐसा कुछ लिखती जाऊँ।
जीवन की सच्चाई कभी और
कभी कल्पना में खो जाऊँ।
जन-जन की बात लिखूँ मैं,
और कभी लिख डालूँ मन की।
कभी सिसकती साॅंसे सुन कर,
लिख डालूँ पीड़ा जीवन की।
कभी चमकते चाँद से पूछूँ,
क्यों घटते बढ़ते रहते हो,
कभी चहकते पंछियों से पूछूँ,
आपस में क्या कहते रहते हो।
सौम्य पवन जब भी बहती है,
तुम इतने याद क्यों आते हो॥
_____✍गीता
मेरी कलम से
Comments
2 responses to “मेरी कलम से”
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वाह, बहुत सुंदर रचना
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बहुत-बहुत धन्यवाद सतीश जी
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