दो किनारे इक नदिया के

दो किनारे इक नदिया के,
चलें साथ-साथ
पर कभी ना हो उनका मिलन
एक दूजे को देखकर ही,
रहते हैं दोनों प्रसन्न
मिलने की भी ना सोचें कभी,
दो किनारे इक नदिया के
उन दोनों के बीच की,
जल-धारा बहे निरन्तर
जल-धारा रहे निरन्तर
वो पावन जल ना सूखे कभी,
वो निर्मल जल ना सूखे कभी
ये ही चाहत करते रहते,
दो किनारे इक नदिया के..
____✍️गीता

Comments

6 responses to “दो किनारे इक नदिया के”

  1. बहुत खूब,वाह वाह

    1. Geeta kumari

      बहुत-बहुत आभार पीयूष जी

    1. Geeta kumari

      शुक्रिया भाई जी

  2. Satish Pandey

    कवि ने बहुत ही बेहतरीन तरीके से नदी के दो किनारों के माध्यम लक्ष्यार्थ साधना की है। हृदय में एकत्रित समस्त भावनाएं, विचार और संवेदनाएं अपनी पवित्रता में अभिव्यक्त हुई हैं। सुन्दर भाव के अलावा काव्य सृजन के मामले में भी कविता उत्कृष्ट है।

    1. Geeta kumari

      कविता की इतने उत्कृष्ट तरीक़े से समीक्षा करने के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद सर। अच्छी समीक्षा एक कवि के लिए प्रेरणा होती है, जिससे उसका उत्साह वर्धन होता है । समीक्षा हेतु आपका बहुत-बहुत धन्यवाद सतीश जी, आभार

Leave a Reply

New Report

Close