*दोस्ती का रिश्ता*

जब वक्त मिले तो पढ़ लेना,
पढ़ लेना रिश्तों की किताब
कुछ रिश्ते मिलते हैं जन्म से,
कुछ रिश्ते देता है यह समाज
किन्तु निज चुनाव से जो रिश्ता,
पुष्पित-पल्लवित होता है हृदय में,
वो रिश्ता, दोस्ती का होता है लाजवाब
_____✍️गीता

Comments

9 responses to “*दोस्ती का रिश्ता*”

  1. अति उत्तम रचना

    1. Geeta kumari

      धन्यवाद पीयूष जी

    1. Geeta kumari

      बहुत-बहुत धन्यवाद भाई जी🙏

  2. Piyush Joshi

    जब वक्त मिले तो पढ़ लेना,
    पढ़ लेना रिश्तों की किताब
    कुछ रिश्ते मिलते हैं जन्म से,
    कुछ रिश्ते देता है यह समाज
    —— बहुत सुंदर रचना, कवि गीता जी ने सहज और गहरे अर्थ को समाहित करती सुन्दर पंक्तियाँ प्रस्तुत की है।

    1. Geeta kumari

      आपकी सुंदर समीक्षा हेतु आपका बहुत बहुत आभार पीयूष जी

  3. Piyush Joshi

    वास्तव में बहुत खूब रचना है

    1. Geeta kumari

      बहुत-बहुत धन्यवाद पीयूष जी, बहुत आभार

  4. Satish Pandey

    कवि गीता जी की यह कविता मानवीय अनुभवों और जीवन के सूक्ष्म निहितार्थों से जुड़ी हुई सुन्दर कविता है। भाषा में प्रवाह है, एक लय है। कवि ने कम से कम शब्दों में सारगर्भित और प्रभावपूर्ण बात कही है।

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