हाथी की तरह
दो दांत मत देना मुझे प्रभो
कि बाहर अलग, भीतर अलग।
दो रूप न दिख पाऊँ।
दो राह न चल पाऊँ।
जैसा भी दिखूँ
एक दिखूँ,
नेक रहूँ।
न किसी से ठेस लूँ,
न किसी को ठेस दूँ।
बिंदास गति में बहती
नदी सा
चलता रहूँ।
हों अच्छे काम मुझसे,
उल्टा न चलूँ
सुल्टा रहूँ,
धूप हो या बरसात हो,
उगता रहूँ,
फूल बनकर
बगीचे में खिलता रहूँ।
महक बिखेरता रहूँ,
प्रेम सहेजता रहूँ।
दो रूप न दिख पाऊँ
Comments
7 responses to “दो रूप न दिख पाऊँ”
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बहुत सुंदर रचना
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Very nice
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बहुत सुंदर
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बगीचे में खिलता रहूँ।
महक बिखेरता रहूँ,
प्रेम सहेजता रहूँ।
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कवि सतीश पाण्डेय जी की अति सुंदर और शानदार कविता -
अतिसुंदर भाव
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जैसा भी दिखूँ
एक दिखूँ,
नेक रहूँ।
न किसी से ठेस लूँ,
न किसी को ठेस दूँ।
बिंदास गति में बहती
नदी सा
चलता रहूँ।
_______ नेक रास्ते पर निर्बाध गति से चलने की प्रेरणा देती हुई कवि सतीश जी की अति उत्तम रचना। अति उत्तम अभिव्यक्ति सुंदर शिल्प और श्रेष्ठ लेखन -

बहुत सुन्दर कविता
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