धन है धन्य
धन का राज है
सबके दिलों में।
बिना धन जिन्दगी का
पथ कठिन।
न हो धन पास जिसके
दूरियां रखते हैं उससे,
ठुंसा हो जेब में जिसके
खूब धन,
भले वह एक धेला भी न दे,
मगर उससे सभी
रखते हैं अपनापन।
सब कुछ भले संभव न हो
लेकिन बहुत कुछ
संभव है धन से,
मान-ईमान हैं
सब कुछ
खरीदे-बेचते धन से।
बहुत धन हो इकट्ठा गर
बड़ा मानव बनूँगा मैं
अगर संचित न कर पाऊँ
वही छोटा रहूँगा मैं।
यही धन है बनाता है
यहां आकार मानव का
यही धन है बढ़ाता है
मनुज के मन में दानवता।
तभी तो बोलते हैं
धन्य है धन
राज धन का है।
करूँ अर्जित इसे
इस बात पर ही ध्यान सबका है।
धन का राज है
Comments
3 responses to “धन का राज है”
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धन्य है धन
राज धन का है।
करूँ अर्जित इसे
इस बात पर ही ध्यान सबका है।
__________ मानव स्वभाव के बारे में यथार्थ चित्रण दर्शाती हुई कवि सतीश जी की उम्दा रचना। किंतु अधिक धन अर्जित करने के दुष्परिणाम की ओर भी एक दृष्टि डालते हुए अति उत्तम लेखन।व्यंग्य और सच्चाई का अद्भुत समन्वय, उच्च स्तरीय प्रस्तुतिकरण -

बहुत सच्ची व सुंदर रचना
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बहुत उम्दा कविता
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