वस्त्रों के बिना नारी शोभा नहीं पाती है
धरती को किया नंगी और शरम नहीं आती है
कैसे सपूत हो तुम जब मां तड़प रही
पीने को शुद्ध पानी ऑक्सिजन नहीं पाती है
प्रथ्वी दिवस मनाकर आजाद हो गए
परमाणु बम की होड़ से प्रथ्वी कि फटती छातहै
ओजोन छिद्र की उसे चिंता सता रही
सरकार फैक्ट्री की स्थापना कराती है
जीवन है इसी गृह में यह जानने के बाद
जनता जनार्दन इसे अब क्यूँ नहीं बचाती है बीमारियों की जड़ है इंसान तेरी भूख
जनसंख्या मत बढ़ाओ प्रथ्वी नहीं बढ़ पाती है
धरती
Comments
3 responses to “धरती”
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पृथ्वी दिवस मना कर तुम आजाद हो गए. सुंदर अभिव्यक्ति
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बहुत सुंदर अभिव्यक्ति
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बिल्कुल सही कहा आपने
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