धर्म के निकेतन

एक पीड़ है हृदय में
एक दर्द है भयंकर।
तड़प रही है धरती
और रो रहा है अंबर।।
जिसने मुझे है लूटा
ज़िन्दगी बनाई बदतर।
कहता मुझे लुटेरा
आखिर बताओ क्योंकर।।
मेहमाॅ बानाके जिसको
रखा था घर में अपने।
मालिक -सा वो बनकर
घर को लगे हड़पने।।
कुछ तो करो ‘विनयचंद ‘
भगवान से निवेदन।
इंसान से भरा हो
ये धर्म के निकेतन।।

Comments

4 responses to “धर्म के निकेतन”

  1. Very nice pandit ji. Kudrat ka kehar hi h ye

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