धीरे-धीरे चल

सिर पर दुपट्टा मेरा,
पैरों में झांझर।
कमर में पानी की गगर बोले,
धीरे-धीरे चल गोरी गांव में आकर,
झांझर के घुंघरू छम-छम बोलें।
सिर पर दुपट्टा मेरा,
माथे पर बिंदिया है।
कानों में मैंने कुंडल हैं डाले,
धीरे-धीरे चल गोरी गांव में आकर।
कानों के कुंडल हौले से बोलें।।
____✍️गीता

Comments

2 responses to “धीरे-धीरे चल”

  1. अतिसुंदर रचना

    1. सादर धन्यवाद भाई जी 🙏, बहुत-बहुत आभार

Leave a Reply

New Report

Close