*धूप हवा और चाँदनी*

मेरे घर के सामने वाले पड़ोसी ने,
अपने घर की इमारत ऊंची उठाई।
घर उनका है मैं कुछ कह भी ना पाई,
पर मेरे आंगन की धूप हवा और
चांदनी ने मुझसे शिकायत लगाई,
फ़िर मैंने बोला उनको,
मत करो इमारत की इतनी लंबी परछाई
मेरे आंगन की दौलत पर,
ना डालो बुरी नज़र
ये धूप ये हवा यह चाँदनी,
मेरे मन को बहुत सुहाई
____✍️गीता

Comments

5 responses to “*धूप हवा और चाँदनी*”

  1. अनुवाद

    बहुत बहुत खूबसूरत

    1. Geeta kumari

      बहुत-बहुत धन्यवाद अनु जी

  2. सुन्दर अभिव्यक्ति। आम जीवन की संवेदना को व्यक्त करती बेहतरीन कविता।

    1. Geeta kumari

      समीक्षा हेतु बहुत-बहुत धन्यवाद सतीश जी

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