नभ में एक तारा टूटा,
और धरा पर तार।
चाॅंदनी मद्धम हुई,
चाॅंद हुआ लाचार।
कभी दिखता कभी छिप रहा है,
नभ के उस तारे को,
चाॅंद ढ़ूंढ़ रहा है।
वह सच्चाई थी या,
था कोई बुरा स्वप्न
चाॅंद गगन में घूम-घूम कर,
सोच रहा है॥
____✍गीता
नभ का एक तारा
Comments
4 responses to “नभ का एक तारा”
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कभी दिखता कभी छिप रहा है,
नभ के उस तारे को,
चाॅंद ढ़ूंढ़ रहा है।
—- कवि गीता जी की बहुत सुंदर रचना। उत्तम भाव उत्तम शिल्प -
सुंदर और प्रेरक समीक्षा हेतु आपका बहुत-बहुत धन्यवाद सतीश जी
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बहुत खूब
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बहुत-बहुत धन्यवाद पीयूष जी
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