नम्रता

नम्रता ही तो है आभूषण
हर्षित करता है सबका मन

जीवन में कोई अवरोध नहीं
प्रगति भी रुकता है कहीं
कर्महीन का सहारा भाग्य
उत्साही का तो हर दिन सौभाग्य —

सब कुछ वह तुरंत ही पाता
औरों को भाग्य समझ आता
लगन से होता जन जागरण
साधारण भी बनता प्रतिभावान

विश्वास शक्ति और महानता का रास्ता
अविश्वासी को नहीं इससे वास्ता
न सीखने से इंसान बूढ़ा बनता जाता
सीख सीख बूढ़ा भी होता जवान

हर विचार तो है इक स्वप्न
कर्म से होता साकार तत्छन
आत्मविश्वास मनुज का बड़ा सद्गुण
अविश्वासी कहां समझ पाए ये गुण

Comments

5 responses to “नम्रता”

  1. Pratima chaudhary

    बहुत सुंदर अभिव्यक्ति

  2. Geeta kumari

    बहुत सुंदर रचना

  3. Suman Kumari

    बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति राजीव भाई-
    “साधारण भी बनता प्रतिभान”

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