यदि नारी से निर्माण हुआ है नया संसार।
फिर क्यों नारी पे हुआ घोर अत्याचार।।
हम कहते है नारी होती है ममता के सागर।
फिर क्यों हुआ बाजार में आज ममता बेकार।।
आंचल में हम युग युग से पलते, बढ़ते आए।
आज हम वही आंचल के बने है खरीदार।।
माँ, बेटी, बहन, पत्नी के रुप इसमें है समाया।
फिर क्यों जुर्म की चक्की में पीस रहे है बार बार।।
कहे कवि “गर नारी न होती, तो हम कहाँ होते।
इसलिए तो पुरुष आज भी है नारी के कर्जदार”।।
—–प्रधुम्न अमित
….. नारी के कर्जदार
Comments
6 responses to “….. नारी के कर्जदार”
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नारी के सम्मान के बारे में समाज को जागरूक करती बहुत सुंदर रचना।
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बहुत खूब
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बहुत खूब!
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सुन्दर अभिव्यक्ति!
सटीक चित्रण । -

बेहतरीन
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Sunder
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