नारी, नहीं रौनक हो तुम

नारी, नहीं रौनक हो तुम
घर की प्राण हो, जान हो तुम
भीतर खुशियों की खनखनाहट
बाहर अभिमान हो तुम।
माँ-बहन-पत्नी, बेटी
रिश्तों का मधुर गान हो तुम
कुछ भी कहे कविता मगर
जिंदगी की शान हो तुम।

Comments

11 responses to “नारी, नहीं रौनक हो तुम”

  1. वाह सर, वास्तव में नारी घर का उजाला है, नारी पर सुन्दर कविता लिखी है।

  2. वाह पाण्डेय जी अतिउत्तम

    1. धन्यवाद जी

  3. नारी के आदर्शों को प्रतिष्ठित करती हुई संवेदनशील तथा तथ्यपरक रचना

    1. इस सुंदर टिप्पणी हेतु हार्दिक धन्यवाद प्रज्ञा जी

  4. Geeta kumari

    कवि सतीश जी ने नारी के बारे में बहुत ही ख़ूबसूरत पंक्तियां लिखी हैं
    पूरी की पूरी कविता इतनी शानदार है कि समझ ही नहीं आ रहा है कि कौन सी पंक्तियां हाई लाइट करूं ,शानदार और मजबूत लेखनी की बेहद शानदार रचना ।
    काबिले तारीफ प्रस्तुति..

    1. इस सुंदर समीक्षागत टिप्पणी हेतु आपको हार्दिक धन्यवाद है गीता जी, इस उत्साहवर्धन हेतु आभार।

  5. अतिसुंदर रचना

    1. सादर धन्यवाद जी

Leave a Reply

New Report

Close