नारी ही नारी के काम नहीं आती

सखि बनती नहीं क्यूं दुश्मन बन जाती है
क्या बताऊं नारी ही नारी के काम नहीं आती।
अपनी बात को मनवाने के लिए
कितने झूठ सच कहा सहारा उसने लिए
अहम तुष्टि की खातिर,क्या-क्या कर जाती है
क्या बताऊं नारी ही नारी के काम नहीं आती।
खुद के गुरूर का आवरण कुछ चढ़ा ऐसा
हर कोई ग़लत, कोई नहीं यहां उसके जैसा
अपनी अच्छाई बताते क्या से क्या कह जाती है
क्या बताऊं नारी ही नारी के काम नहीं आती।
बेटियां अच्छी तभी तक,बहु न बनती जब-तक
आखिर सही साबित करे वो खुद को कहां तक
कब- कैसे कयी दुर्गुणों का कोष बन जाती है
क्या बताऊं नारी ही नारी के काम नहीं आती ‌।
कितना अच्छा हो,हर क़दम पर साथ मिलता हो
ग़लत करके भी, सीखने का अवसर मिलता हो
तुरंत कैसे परिपक्वता की उम्मीद की जाती है
क्या बताऊं नारी ही नारी के काम नहीं आती।

Comments

3 responses to “नारी ही नारी के काम नहीं आती”

  1. Praduman Amit

    अच्छी सोच है।

    1. Suman Kumari

      सादर आभार

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