नारी को न समझो खिलौना मनुज,
वह भी एक इंसान है।
जन्म देती है इंसान को,
सोचो कितनी महान है।
बन कर मासूम सी बिटिया,
तुम्हारा घर महकाने आई है।
बन कर बहन जिसने,
सजाई भाई की कलाई है।
करके विवाह तुम्हारे संग,
घर जन्नत बनाया है
तुम्हारी सहभागिनी बन,
तुम्हारा वंश बढ़ाया है
फिर किस कारण से ,
उसे तुम तुच्छ कहते हो
वह ममता की मूरत है,
तुम्हारे परिवार को निज मान,
बड़े प्रेम से अपनाया है।
वह पावन अग्नि सी महान है,
जिसने रची सृष्टि सारी है
ज़रा सा ध्यान से देखो,
खिलौना नहीं है नारी है।
_____✍️गीता
नारी
Comments
6 responses to “नारी”
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नारी का सच्चा स्वरूप प्रकट करती कवि गीता जी की सुन्दर पंक्तियां
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सुंदर समीक्षा हेतु आपका बहुत बहुत धन्यवाद सतीश जी 🙏
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बहुत खूब
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सादर आभार भाई जी 🙏
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बहुत सुंदर रचना
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बहुत-बहुत धन्यवाद सर
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