औरत मजह कोई
दिल बहलाने वाला खिलौना नहीं
जीती-जागती इंसान है
कोई क्यों नहीं समझता
कि उसमें भी जान है
पुरुष स्त्री को सिर्फ
विलासिता की वस्तु समझ लेता है
उसकी भावनाओं के संग खेलकर
सिर्फ मजा लेता है
औरतें अपने आपको
प्रेम के वशीभूत होकर पुरुष को
समर्पित कर देती हैं
बिना उसके अन्दर के पापी विचारों को जाने
देवता मान बैठती हैं
उठ जाग नारी….
तुझमें ही है दुनिया सारी
जो तू समझे पुरुष को श्रेष्ठ
तो यह तेरी गलती है भारी
ना….री…..ना…..री….!!!
ना….री…..ना…..री….!!!
Comments
6 responses to “ना….री…..ना…..री….!!!”
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सच ही तो है फिर भी संसार विकल
ज्ञानी ही हरे मन का भार सकल-

धन्यवाद
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स्वयं में ही हैं सारे पूर्ण
अकेलेपन का अहसास अनुपम
किंतु इसमेें ही होता अधिकार का हनन-

जी धन्यवाद
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बहुत सुंदर और सच्चाई को साथ लिए हुए बेहद शानदार रचना
“स्वयं के दोष दिखे नहीं,नारी को दोष दिया
पुरुषों की इस सोच ने आखिर ,किसका भला किया” बहुत अच्छी कविता लिखी है प्रज्ञा ,एकदम जबरदस्त, लाजवाब👏👏-

सुंदर समीक्षा के लिए धन्यवाद
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