6 Comments

  1. स्वयं में ही हैं सारे पूर्ण
    अकेलेपन का अहसास अनुपम
    किंतु इसमेें ही होता अधिकार का हनन

  2. बहुत सुंदर और सच्चाई को साथ लिए हुए बेहद शानदार रचना
    “स्वयं के दोष दिखे नहीं,नारी को दोष दिया
    पुरुषों की इस सोच ने आखिर ,किसका भला किया” बहुत अच्छी कविता लिखी है प्रज्ञा ,एकदम जबरदस्त, लाजवाब👏👏

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