नैनों के तटबंध

नैनों के तटबंध से
बहे अश्रु की धार
मुख तो पट बंद हैं
भीतर घोर अन्धकार
भीतर घोर अंधकार,
कहां से दिया जलाएँ
बैठे-बैठे लुट गए
किसे अब दोष लगाएं??

Comments

4 responses to “नैनों के तटबंध”

  1. राकेश पाठक

    यथार्थ

    1. Pragya

      धन्यवाद पाठक जी

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