….न बुझाओ तूम पहेलियाँ

सुना है हमने अपने वतन पे,
अपने वतन की कहानियाँ।
तिलक पटेल आज़ाद छोड़ गए थे,
अपनी कई निशानियांँ।।
खेले – पले हुए थे, अनेक वीर जवां,
थी यही धरती माँ की मेहरबानियाँ ।
कर्ज चुकाने की जब आई घड़ी,
कहे थे भगत – “न बुझाओ तुम पहेलियाँ”।।
आज़ादी बन गई उनके लिए , आन बान और शान,
तभी तो कर दिए वीर, वतन के नाम जिंदगानियाँ।
सन १९४७ में, जब लहराया तिरंगा आज़ादी का,
तब धरती माँ ने ली थी, बड़ी जोर से अंगड़ाईयाँ।।

Comments

10 responses to “….न बुझाओ तूम पहेलियाँ”

  1. Anika Chaudhari Avatar
    Anika Chaudhari

    Laajbaab!!!!

    1. Praduman Amit

      Thanks

  2. Satish Pandey

    वाह जी वाह

    1. Praduman Amit

      Thanks

  3. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    Behtrin

  4. Praduman Amit

    Thanks

  5. तुम
    तिलक, पटेल
    सुंदर रचना प्रस्तुत की है

    1. Praduman Amit

      शुक्रिया।

      1. वेलकम

      2. Praduman Amit

        शुक्रिया।

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