परिभाषा

प्रेम की परिभाषा नहीं जानते
वो ही बढ़ चढ़ इसे बखानते

चाहतें जो रही कभी हमारी
वही चाहत रही होगी तुम्हारी
इसलिए कभी मैं ऊब जाता
अनमना सा किया जब पाता

समाज ने इक बंधन तो बांधा
इसे तो हमेशा क्रंदन ही भाया
रिश्तों के नाम पर हर हमेशा
वेदी चढ़ा स्वयं हित ही साधा

समर्पण बिना हर प्रेम अधूरा
चाहकर भी न उत्पन्न हो पूरा
स्वयं उत्पन्ना जिसकी नियति हो
प्रयत्न से भला कैसे फलित हो

Comments

4 responses to “परिभाषा”

  1. Satish Pandey

    सुन्दर अभिव्यक्ति, बहुत सुंदर

Leave a Reply

New Report

Close