“पश्चाताप की चादर”

मैं फिर से नींद के आगोश में जाना चाहती हूँ
तेरे नैनो के गंगाजल से गंगा स्नान करना चाहती हूँ
मैं हूँ पतित, पापों की गगरी हूँ
अपने गुनाहों को पश्चाताप की चादर में छुपाना चाहती हूँ।।

Comments

2 responses to ““पश्चाताप की चादर””

  1. Praduman Amit

    वाह प्रज्ञा जी,नारी की व्यथा को सुंदर रुप में प्रस्तुत किया है। भावपूर्ण रचना है।

    1. बहुत बहुत धन्यवाद 

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