पाकीज़गी अब दिखती नहीं ,
इन आबो-हवा में भी ।
कभी दम घुटता है तो,
कभी मन ।
कभी सास भी बेपरवाह हो जाती है ,
हां, यह रुख भी बदला है ,
अब सुकून देती नहीं,
चैन छीन लेती है ,तो कभी नींद।
परिवेश बदला है, या हम ।
पाकीज़गी अब दिखती नहीं,
इन आबो-हवा में भी।
पाकीज़गी अब दिखती नहीं।
Comments
10 responses to “पाकीज़गी अब दिखती नहीं।”
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सुन्दर पं्तियां
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बहुत बहुत धन्यवाद मैम
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बड़ी सुन्दर रचना है आपकी
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बहुत बहुत धन्यवाद
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अतिसुंदर भाव
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बहुत बहुत आभार 🙏
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Nice
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Thank you
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सुन्दर पं्तियां
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Thanks
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