पानी पानी की

एक ताज़ा ग़ज़ल ……..

गुलफिशानी – फूलों की बारिश ,
बदगुमानी – शक

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मैंने दुश्मन पे गुलफिशानी की …
आबरू.. उसकी पानी पानी की ….

मुझ पे जब ग़म ने मेहरबानी की …..
मैने फिर ग़म की मेज़बानी की ….

मैं जिन आँखों का ख़्वाब था पहला
क्यों ….. उन्होंने ही बदगुमानी की….

वार मैंने निहत्थों पे न किया
यूँ अदा रस्म ख़ानदानी की …….

होठ उनके न कह सके जब सच
फ़िर निग़ाहों से सच बयानी की ….

सोचा बेहद के क्या रखूँ ता – उम्र
फ़िर ग़ज़ल ” प्रेम ” की निशानी की …..

पंकजोम ” प्रेम ”

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Comments

3 responses to “पानी पानी की”

  1. Abhishek kumar

    Wow

  2. बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति

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