पायल को मीठी छम सी

बातें बना रहे हो
बेकार में अनेकों
चाहत कहाँ है गुम सी
पायल की मीठी छम सी।
डग-मग कदम चले हैं
जिस ओर हम चले हैं
नजरों का फर्क क्यों है
मन से तो हम भले हैं।
चारों तरह सवेरा
मन में घिरा अंधेरा,
उग आई क्यों निराशा
खुद से ही खुद छले हैं।
सोते समय जगे हैं
जगते समय हैं सोये
पाया नहीं है पाना
अश्कों में हम गले हैं।
तुम भी रहे हो बहका
समझे हो क्यों खिलौना
मुस्का दो आज फिर से
मैं तो हूँ, अब कहो ना।

Comments

3 responses to “पायल को मीठी छम सी”

  1. Geeta kumari

    बहुत ख़ूब, अति सुंदर कविता

  2. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    बहुत सुंदर रचना

  3. Satish Pandey

    तुम भी रहे हो बहका
    समझे हो क्यों खिलौना
    मुस्का दो आज फिर से
    मैं तो हूँ, अब कहो ना।
    —– उलाहना से अलंकृत बहुत ही खूबसूरत रचना, भाषा व शिल्प का सुन्दर तालमेल। वाह

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