पुलवामा

लकड़बग्घे से नहीं अपेक्षित प्रेम प्यार की भीख,
किसी मीन से कब लेते हो तुम अम्बर की सीख?
लाल मिर्च खाये तोता फिर भी जपता हरिनाम,
काँव-काँव हीं बोले कौआ कितना खाले आम।

डंक मारना हीं बिच्छू का होता निज स्वभाब,
विषदंत से हीं विषधर का होता कोई प्रभाव।
कहाँ कभी गीदड़ के सर तुम कभी चढ़ाते हार?
और नहीं तुम कर सकते हो कभी गिद्ध से प्यार?

जयचंदों की मिट्टी में हीं छुपा हुआ है घात,
और काम शकुनियों का करना होता प्रति घात।
फिर अरिदल को तुम क्यों देने चले प्रेम आशीष?
जहाँ जहाँ शिशुपाल छिपे हैं तुम काट दो शीश।

अजय अमिताभ सुमन:अजय अमिताभ सुमन

Comments

7 responses to “पुलवामा”

      1. राही अंजाना Avatar

        सर राही की पोस्ट पे भी लाइक करें।
        सरहद के शहीद

    1. Ajay Amitabh Suman Avatar
      Ajay Amitabh Suman

      धन्यावाद

    1. Ajay Amitabh Suman Avatar
      Ajay Amitabh Suman

      धन्यवाद

  1. महेश गुप्ता जौनपुरी Avatar

    वाह बहुत सुंदर रचना ढेरों बधाइयां

Leave a Reply

New Report

Close