ऊपर वाले ने कहर बरसाया है
एक बूंद धरा पर न आया है
धरती पर देखो आई दरार
चारों ओर मचा हाहाकार
कर्ज तले दबे हैं कितने किसान
क्या करें सोचते हैं सुबह शाम
घर अपना कैसे चलाएंगे
क्या खाएंगे क्या बच्चों को खिलाएंगे
बीता सावन भादो बीता
वर्षा की आस में दिल टूटा
करवट में रात बिताते हैं
क्या करें समझ नहीं पाते हैं
कई दिन से चूल्हा ना जला देखा
बच्चों को रोता बिलखता देखा
जब परिवार को भूखा सोता देखा
तो फंदे को गले में लगा बैठा
ऐ खुदा बस इतनी है इल्तजा
यह कहर कभी ना बरसाना
तेरी फुलवारी के फूल है हम
गुलशन न कभी उजड़ने देना
रीना कुमारी
तुपुदाना, राँची झारखंड
Tag: सैनिक पर कविता
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किसान का दर्द
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क्या तुम अब भी वैसे ही जीते हो?
(जब किसी परिवार का एक बेटा शहीद हो जाता है और चंद सालों बाद सारी दुनिया उसके परिवार के दुखों को भुला देती है,
उस समय उसके घर के दरवाजे से गुजरती पुरानी हवाये जो उस घर को हमेशा खेलते,मुश्कुरते देखती थी,अब उस परिवार को विकट परिस्थिति में देखकर उस परिवार के हर सदस्य से कैसे-कैसे सवाल करती है):-
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काफ़ी दिनों बाद लौटा फिर उस गली से,
जहाँ खुशियों का एक परिवार रहता था।
अब यहां तो शान्ति का कहर बरस रहा है
जहाँ से कभी शोर का शहर गुजरता था।
आखिर पूछ बैठा वहाँ के सन्नाटों से,
ये घुटन की घुट रोज कैसे पीते हो,
क्या तुम अब भी वैसे ही जीते हो?(घर आसपास में परिस्थितियों से सवाल:-)
बदल चुकी है हवा की रूखे,
मौसम लग रहे सूखे-सूखे,
भरी दुपहरी अंधियारों का दस्तक,
खुशियां झुकाए खड़ी है मस्तक,
यादों के घेरे में,दर-दर फिरते हो,
क्या तुम अब भी वैसे ही जीते हो?(पत्नी से सवाल)
हृदय में हुआ विलापों का अधिगम,
चक्षु बना मेघो का संगम,
होंठ कर रहे करुण सवाल,
जी हर पल हो रहा बेहाल,
ये भयानक कारावास कैसे सहते हो।
क्या तुम अब भी वैसे ही जीते हो?(पिता से सवाल)
गालों पर नही अब हंसी की दरारें,
मन खोया किसी समुद्र किनारे,
आंखों में रहती है आंसू की बूंदे,
आवाजें रहती रुंधे-रुंधे,
ऊपर से उजड़े,अंदर से रीते हो।
क्या तुम अब भी वैसे ही जीते हो?(माँ से सवाल)
विशाल आँचल है सुना सुना,
ममता बना बिलखता नमूना,
सुनी गोंद के उजड़े आंगन में,
स्तन्यकाल के साधन में,
बुढापे के सपनों को रोज-रोज घिसते हो।
क्या तुम अब भी वैसे ही जीते हो?(बहन से सवाल)
बैठे-बैठे बस रोते जाना,
चहचहाने के लिए खोजना बहाना,
बाल खिंचने पर चिल्लाना,
रूठ कर झूठे मन्नते करवाना,
पुराने झगड़ो को फिर भी खिंचते हो।
क्या तुम अब भी वैसे ही जीते हो?(भाई से सवाल)
गली मोहल्ले के गुल्ली डंडे,
लगते है सब अब गला के फंदे,
कमरे में फैली रहती है उदासी,
मन खोज लेती जीने की तलाशी,
जैसे कि सारे गम कल ही बीते हो।
क्या तुम अब भी वैसे ही जीते हो? -
Saheedi
Ghar ghar chitthi aaj
Saputo ne bheji h
Ghr me cuha mare
Sarhad pr saheedi hAnkhe tak tak jgti h
Kya diwali kya eidi h
Rat sansanati thand thi
Har rat aise beeti hGhar ki chowkidar begam
Meri maa ki anchal seeti h
Din rat use furshat nhi hoti
Jane ansu kaise peeti hChl pde kadam to n ruke
Sammanit ye niti h
Ham jante h tumhe bta du
Anjaam mera saheedi h -
जब छूटेंगे हम तीरों से
कितने भी जुल्म तुम कर लो,
बांध दो कितनी ही जंजीरो से
मिटा देंगे तेरी हस्ती पल भर में
जब छूटेंगे हम तीरों से -
नमन वीर
भारत माँ के प्यारे वीरो
मेरा आप सबको प्रणाम है
जो हो गए शहीद, देश की खातिर
वीर तुम्हे सलाम हैघर छोड़ा ,संग छोड़ी मोह माया
सर्वस्व निछावर कर दिया
ऐसे मेरे भारत के वीरों
मेरा शत शत प्रणाम हैआँधी झेली तूफ़ां झेले
झेलीं राहों में मुश्किलें
फिर भी अडिग खड़े रहे तुम
देश की सीमा पर डटे हुएनमन करें हम उन सबको मिलकर
जिनके खातिर हम सलामत हैं
चैन की नींद से सुला रहें हैं
खुद रातों को जाग रहें।। -
Teri yado ke sahare
कब तक जिए हम तेरी यादों के सहारे
तेरे बिना नींद भी आती नहीं यादों के सहारे
तेरे बिना जीना नहीं ये माना था मैंने
पर तेरे बिना पड़ेगा जीना ये न जाना था मैंने,
तेरे ख्वाबों को सजा कर एक-एक पल संजोए थे मैंने ,
पर सब बिखर कर रह गए वह सपने हमारे ,
अब पड़ेगा जीना तुझ बिन हमारी निशानी के लिए ,
देना पड़ेगा हम दोनों का प्यार उन्हें जीने के लिए,
तिल तिल जोड़कर जिंदगी भर लगाया आपने ,
खुशियों की तमन्ना जीवन भर जो संयोया आपने,
पूरा हो ना सका वह ख्वाब ये जाना हमने,
वह सारे ख्वाब करेंगे पूरा करेगे ये लाल हमारे ,
मिलेगी खुशियां ये देखकर जन्नत से तुम्हें |पुलवामा शहीदो की पत्नियो की व्यथा
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Teri yado ke sahare
कब तक जिए हम तेरी यादों के सहार
तेरे बिना नींद भी आती नहीं यादों के सहारे
तेरे बिना जीना नहीं ये माना था मैंने
पर तेरे बिना पड़ेगा जीना ये न जाना था मैंने,
तेरे ख्वाबों को सजा कर एक-एक पल संजोए थे मैंने ,
पर सब बिखर कर रह गए वह सपने हमारे ,
अब पड़ेगा जीना तुझ बिन हमारी निशानी के लिए ,
देना पड़ेगा हम दोनों का प्यार उन्हें जीने के लिए,
तिल तिल जोड़कर जिंदगी भर लगाया आपने ,
खुशियों की तमन्ना जीवन भर जो संयोया आपने,
पूरा हो ना सका वह ख्वाब ये जाना हमने,
वह सारे ख्वाब करेंगे पूरा करेगे ये लाल हमारे ,
मिलेगी खुशियां ये देखकर जन्नत से तुम्हें |पुलवामा शहीदो की पत्नियो की व्यथा
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teri yado ke sahare
कब तक जिए हम तेरी यादों के सहारे,
तेरे बिना नींद भी आती नहीं यादों के सहारे,
तेरे बिना जीना नहीं ये माना था मैंने,
पर तेरे बिना पड़ेगा जीना ये न जाना था मैंने,
तेरे ख्वाबों को सजा कर एक-एक पल संजोए थे मैंने ,
पर सब बिखर कर रह गए वह सपने हमारे ,
अब पड़ेगा जीना तुझ बिन हमारी निशानी के लिए ,
देना पड़ेगा हम दोनों का प्यार उन्हें जीने के लिए,
तिल तिल जोड़कर जिंदगी भर लगाया आपने ,
खुशियों की तमन्ना जीवन भर जो संजोया आपने,
पूरा हो ना सका वह ख्वाब ये जाना हमने,
वह सारे ख्वाब करेंगे पूरा ये लाल हमारे ,
मिलेगी खुशियां ये देखकर जन्नत से तुम्हें |फुलवामा शहीदो की पत्नियो की व्यथा
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Pulbama
छोड़कर मुझे तुम इतनी जल्दी क्यों चले गए ,
अभी तो सुख के पल आए ही थे अभी ही चले गए ,
जाने किसकी बुरी नजर लगी सब सपने अधूरे कर चले गए,
जी रही हूं तुझ बिन अधूरी अधूरे सपने लिए ,
जी रही हूं तेरी यादों के सहारे तेरे अधूरे ख्वाबों के लिए,
जी रही हूं तेरी निशानी के सहारे बस सिर्फ उनके लिए ,
हसरत थी साथ जीने साथ मरने की पर हो ना सका ये,
तू ही बता कैसे जियूं मैं तुझ बिन अपनों के लिए,
तेरी कही हर बात याद आती है जीने के लिए,
तेरे सब सपने पूरा करेंगे हम यह वादा है तुमसे ,
तेरी यादों को ना भुला पाएंगे हम यह वादा है तुमसे ,
हमारे लाल को भरपूर प्यार देंगे यह वादा है तुमसे |फुलवामा शहीदो की पत्नियो की भावनाए
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Adamya sahas ki pahchan
अदम्य साहस की पहचान,
भारत के ये वीर जवान ,
मातृभूमि की रक्षा के लिए,
जान हथेली पर रखकर,
ये कर देते जीवन कुर्बान,
ये है अभिनंदन जैसे वीर जवान ,
हमारे पूज्य है ये वीर जवान,
पर है कुछ लोग यहां के ,
जो दाव लगा देते हैं वतन का सम्मान ,
जो दे रहे हैं जाने अनजाने साथ पाक का,
यह वक्त नहीं है राजनीति का ,
यह वक्त नहीं है सबूत मांगने का,
यह वक्त है हौसला बढ़ाने का ,
जरा होश में आओ वतन के लोगों,
छोड़कर सब अपना स्वार्थ ,
अब मत करो वीरों का अपमान,
वतन मे रहकर करते हो वतन का ही अपमान | -
Adamya sahas ki pahchan, Bharat ke ye vir jawan.
अदम्य साहस की पहचान,
भारत के ये वीर जवान ,
मातृभूमि की रक्षा के लिए,
जान हथेली पर रखकर,
ये कर देते जीवन कुर्बान,
ये है अभिनंदन जैसे वीर जवान ,
हमारे पूज्य है ये वीर जवान,
पर है कुछ लोग यहां के ,
जो दाव लगा देते हैं वतन का सम्मान ,
जो दे रहे हैं जाने अनजाने साथ पाक का,
यह वक्त नहीं है राजनीति का ,
यह वक्त नहीं है सबूत मांगने का,
यह वक्त है हौसला बढ़ाने का ,
जरा होश में आओ वतन के लोगों,
छोड़कर सब अपना स्वार्थ ,
अब मत करो वीरों का अपमान,
वतन मे रहकर करते हो वतन का ही अपमान | -
पुलवामा
लकड़बग्घे से नहीं अपेक्षित प्रेम प्यार की भीख,
किसी मीन से कब लेते हो तुम अम्बर की सीख?
लाल मिर्च खाये तोता फिर भी जपता हरिनाम,
काँव-काँव हीं बोले कौआ कितना खाले आम।डंक मारना हीं बिच्छू का होता निज स्वभाब,
विषदंत से हीं विषधर का होता कोई प्रभाव।
कहाँ कभी गीदड़ के सर तुम कभी चढ़ाते हार?
और नहीं तुम कर सकते हो कभी गिद्ध से प्यार?जयचंदों की मिट्टी में हीं छुपा हुआ है घात,
और काम शकुनियों का करना होता प्रति घात।
फिर अरिदल को तुम क्यों देने चले प्रेम आशीष?
जहाँ जहाँ शिशुपाल छिपे हैं तुम काट दो शीश।अजय अमिताभ सुमन:अजय अमिताभ सुमन
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सरहद के शहीद
वीर थे अधीर थे सरहद के जलते नीर थे,
इस देश के लिए बने तर्कश के मानो तीर थे,भगतसिंह राज गुरु सहदेव ऐसे धीर थे,
बारूद से भरे हुए ये जिद्दी मानव शरीर थे।इंकलाब से हिलाये दिए अंग्रेज चीर थे,
स्वतंत्रता संग्राम में फूँके सहस्र शीष थे,इतिहास के पटल पे छोड़े स्वर्णिम प्रीत थे,
तिरंगे में लिपटके बोले वन्दे मातरम् गीत थे।।
राही अंजाना -
शहीदों को नमन
नमन आज़ादी के परवानों का।
वंदन क्रांति वीर जवानों का।।भगत, सुखदेव क्रांति वीरों के,
इंक़लाब का डंका बजता था।
‘तिलक’ के विचारों का तिलक,
राजगुरु के भाल सजता था।
आज़ाद भारत का सपना,
दिलों में इनके बसता था।
स्वराज के अधिकार को पाना,
ख़्वाब आज़ादी के अरमानों का।
नमन आज़ादी के परवानों का।
वंदन क्रांति वीर जवानों का।।अंग्रेजी हुकूमत हिला डाली,
क्रांतिकारियों की टोली।
फिरंगी डर से कांपते,
सुन इंक़लाब की बोली।
‘लाला’ का बदला लिया,
मार सांडर्स को गोली।
बहुत सह चुके, ज़ुल्मो-सितम,
संकल्प, दमन सभी हैवानों का।
नमन आज़ादी के परवानों का।
वंदन क्रांति वीर जवानों का।।बहरी सरकार को सुनाने,
भरी सभा बम फोड़ा था।
अपनी बात रखने को,
लिख पर्चा एक छोड़ा था।
‘साइमन कमीशन’ के खिलाफ,
शोषण पर चुप्पी तोड़ा था।
सिंहों की गर्जना सुन हिला,
तख्त फिरंगी हुक्मरानों का।
नमन आज़ादी के परवानों का।
वंदन क्रांति वीर जवानों का।।इनके देश भक्ति को,
अपराध का नाम मिला।
चला ढोंग मुकदमें का,
मृत्यु दंड पैगाम मिला।
रात में इन कायरों से,
फांसी का इनाम मिला।
सांसें छिन ली, असमय ही तुमने,
आवाज़ ना घोंटा आह्वानों का।
नमन आज़ादी के परवानों का।
वंदन क्रांति वीर जवानों का।।हंसते हुए चुम,
सूली पर वह झूल गए।
मां भारती पर,
मां की ममता भूल गए।
प्रबल हुआ संग्राम,
दे उनकी छाती में शूल गए।
शहादत उनकी बनी आंदोलन,
रण शंखनाद हुआ दीवानों का।
नमन आज़ादी के परवानों का।
वंदन क्रांति वीर जवानों का।।“आंखें नम हुई, कर उन शहीदों को याद।
बुलंद उद्घोष हुआ, उनकी शहादत के बाद।
अंग्रेजों भारत छोड़ो, अंग्रेजों भारत छोड़ो,
इंकलाब जिंदाबाद, इंकलाब जिंदाबाद।”देवेश साखरे ‘देव’
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अभियान नवगीत “
अभियान नवगीत ”
————————
बांधे सर पे मस्त पगड़िया
राह कठिन हो,चलना साथी
दुराचार ख़तम करने अब
उतार चलो काँधे की गाँती
आन ,बान और शान हमारे
अच्छे- सच्चे हैं वनवासी
दिलों – दिलों को दर्द बताने
महफिल – महफिल खड़ी उदासी
आँखें भर – भर उठती हैं
मां जब अपनी कहर सुनाती
बांधे सर पे …………….
जोते – बोये ,कोड़े -सींचे
धरती में अपना खून -पसीना
फसलें हरी भरी लहरायें
हर्षित हुआ कृषक का सीना
सभी घरों में पेट को भरते
बेटे ,पोते, नतिनी -नाती
बांधे सर पे………………
घर- आँगन का नन्हा बच्चा
नाचे ,झूमे और इठलाये
वहीं ,किसान का बेटा ,सीमा पर
हंसते – हंसते गोली खाये
संबंधों की स्मृतियों संग
आँखें खुली -खुली रह जातीं
बांधे सर पे मस्त पगड़िया
कठिन राह पे चलना साथी |
– सुखमंगल सिंह -
Martyr’s Day Contest: Reply to Saavan team’s request
Dear All,
This is in reply to Saavan team’s request to share the ways I used for promotions of my poem for Martyr’s Day Contest. It was a joint effort of me, my daughter and my younger brother. I run a personal blog by the name – Jeevan Dhara, which has an active viewership of 5k people and also, I am an active contributor to various fb poetry pages. For the contest, I tried to personally reach out to my friends from these communities.
My daughter is a Unesco India fellow and has been extensively writing for various online magazines – YouthKiAwaaz, Inc42, Nextbigwhat. Given to her active online work and following, she has been able to get a big percentage of the likes.
Also, my brother is a reputed doctor with over 7 years of experience and a strong network of patients and friends, who have been kind enough to like and appreciate the poem.
For more clarity, you may visit our respective facebook profiles and see the likes on the posts –
Santosh Gupta: https://www.facebook.com/santoshgupt/posts/1480607521981851
Yatti Soni: https://www.facebook.com/yattisoni11/posts/1681781675170315
Ritu Soni: https://www.facebook.com/nilu.soni.739/posts/656637384519445
Thanks 🙂
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Dear Saavan Team,
I wanted to take a moment to extend my most sincere thanks for choosing my poem first in martyr contest. I received a message regarding 2.2k like on my poem. I want to assure all of you there is full transparency. I am research scholar in BHU where approx 35k studetns.So it is possible. Hope you understand it.
I also extend my thanks to all BHU students and others for liking and sharing my poem.
Gratefully
Nitesh Chaurasia
Research Scholar,
IIT BHU, Varanasi
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शहीदी
लगे मैले हर साल,
मालायें भी पहनायी फूलों की
पथरायी मूर्तियों को कई बार
मगर पत्थर की मूरत
कभी मुस्कुराई नहीं कभी
एक भी बार
पता नहीं क्यों!Please like & share my poem
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कैद आजादी
कैद अपने ही घरों में हमारी आजादी रही थी,
सूनी परिचय के बिन जैसे कोई कहानी रही थी,
आसमाँ खाली रहा हो परिंदों की मौजूदगी के बगैर,
कुछ इसी तरह मेरे भारत की जवानी रही थी,
हिला कर रख देने में फिर वजूद ब्रिटिश सरकार के पीछे,
तब भगत सिंह और राज गुरु संग कई क्रांतिकारियों की कुर्बानी रही थी॥
राही (अंजाना) -
शहीदी
कुछ मेरी औकात नहीं , कि तुझ पर कलाम चलाऊं मैं
कुर्बानी तेरी करे बयां , वो शब्द कहाँ से लाऊं मैं
नाम तेरा लेने से पहले पलकों को झपकाउं मैं
भूल गए जिन पन्नो को हर्फ़ों से आज सजाऊँ मैं
जब भारत माँ का आँचल लगा चीर-चीर होने
गोरे बसने आये जैसे नागिन आयी हो डसने
जब भारत का सूरज भी त्राहिमाम चीखा था
तब खटकड़ में एक सिंहनी की कोख से सूरज चमका था
भारत माँ बोली कि मैं गद्दारों पर शर्मिंदा हूँ
चीख पड़ा सरदार माँ अभी तलक मैं जिन्दा हूँ
अंग्रेजों को घाट घाट का पानी उसने पिला दिया
अंग्रेजी सत्ता का तख़्त-ओ -ताज पूरा हिला दिया
आजादी के हवन कुंड में वो तो अग्निचेतन था
अंग्रजों के सीने का तीरों के जैसे भेदन था
तुझे गले लगा कर तो वो फांसी भी रोई होगी
झूलते देख लाडला फांसी, धरती की चुनर धानी रोई होगी
रोया होगा इंकलाब का भी वो बासंती चोला
चूमा जब फांसी को तूने अम्बर भी होगा डोला
तड़प गयी होंगी लहरे सागर भी रोया होगा
फांसी वाले आँगन का पत्थर पत्थर रोया होगा
दूर कही अम्बर में तारा भी टूटा होगा
आँखों में जब तेरी खून का लावा फूटा होगा
तूने आजादी के मंदिर की बुनियाद खड़ी की थी
इंकलाब की बलीदेवी पर अपनी शाख बड़ी की थी
तेरी कुर्बानी का अब ये क्या अहसान चुकाएंगे
गांधीजी के बन्दर है बस कुर्सी कुर्सी चिल्लायेंगे
याद तूम्हे नवम्बर 14 , नहीं भूले 2 अक्टूबर को
30 जनवरी याद रही , पर भूले भारत के बेटों को
23 मार्च को याद जरा उन शहीदों को भी कर लो
आँखों में भर लो पानी और सीने से चिंगारी उगलो ।।
तेरी पूजा में तो बस मैं इतना ही कह सकता हूँ
तेरी छोटी आयु को सदियों से लंबी कह सकता हूँ
शत शत बार नमन है तुझको तेरी जवानी को
बार बार दोहरायेगा इतिहास तेरी कहानी को ।।
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शहीदों की होली
“एक ये भी होली है एक वो भी होली थी जो शहीदों ने खेली थी, देश को आज़ाद कराने की ख़ातिर…मेरी कविता 23 मार्च पर शहीद दिवस के उपलक्ष्य में शहीदों को नमन करती है…..”
रंगों का गुबार धुआँ बन कर,
उठ रहा है मेरे सीने में…………….
वो रंग जो ‘आज़ादों’ ने भरा था,
आज़ादी की जंग में,
वो रंग जो निकला था आँखों से,
चिनगारी में,
वो रंग जिससे लाल हुई थी,
भारत माता,
इन्हीं रंगों का गुबार धुआँ बनकर,
उठ रहा है मेरे सीने में…………….
रंग जो उपजे थे, उबले थे, बिखरे थे,
आज़ादी का रंग पाने,
वो रंग जो शहीदों ने पहने थे,
सीना ताने,
उन केसरिया, लाल, सफ़ेद, और काले रंगों को,
रंगों के उस मौसम को,
मेरा सलाम…..
उन नामचीन ‘आज़ादों’, बेनामी किताबों,
उन वीरांगनाओं, उन ललनाओं,
थोड़ी सी उन सबलाओं, हज़ारों उन अबलाओं को,
मेरा सलाम……
बंटवारे में जो बंट गईं, भूखे पेट दुबक गईं,
कोड़े खाकर भी जो कराह न सकीं,
कुएँ में कूद कर भी जो समा न सकीं,
उन हज़ारों आत्माओं को,
मेरा सलाम……..
इतिहास के गर्त से उकेर कर,
सिली हुई तुरपाइयों से उधेड़ कर,
निकाली गई, हमें दिखाई गई,
1947 में आज़ादी के दीवानों की,
होली की उस उमंग को,
‘शहीदों की होली’ की उस कहानी को,
मेरा सलाम…………..
स्वरचित ‘मनीषा नेमा’
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शहीद हुए मतवाले
। भगत सिंह और राजगुरु के संघर्षों बलिदानों की,
ये धरती है वीर बहादुर चौड़ी छाती वालों की,
ब्रिटिश राज को धूमिल कर मिट्टी में मिलाने वालों की,
माँ के आँचल को छोड़ तिरंगे की शान में मिटने वालों की,
ये कविता नहीं कहानी है उन माँ के प्यारे लालों की,
खोकर अपनी हस्ती को भी अमर हुए जवानों की,
झुककर नमन करने फिर आँखों में अश्रु आने की,
लो फिर से आई है बेला याद करें हम,
देश की खातिर लड़ते लड़ते जो शहीद हुए उन मतवालों की॥
राही (अंजाना) -

वो माटी के लाल
वो माटी के लाल हमारे,
जिनके फौलादी सीने थे,
अडिग इरादो ने जिनके,
आजादी के सपने बूने थे,
हाहाकार करती मानवता,
जूल्मो-सितम से आतंकित
थी जनता, भारत माता की
परतंत्रता ने उनको झकझोरा था,
हँसते-हँसते फाँसी के फँदे
को उन्होंने चूमा था,
वो माटी के लाल हमारे,
राजगुरू, सुखदेव,भगतसिंह ,
जैसे वीर निराले थे ,
धधक रही थी उनके,
रग-रग में स्वतंत्रता
बन कर लहू, वो दीवाने थे,
मतवाले थे, भारत माता के,
आजादी के परवाने थे,
बुलन्द इरादों ने जिनके,
स्वतंत्रता की मशाल जलायी थी ,
भारत माता की बेड़ियों को,
तोड़ने की बीड़ा उठायी थी,
अंग्रेजों के नापाक मनसूबों को,
खाक में मिलाने की कसम खायी थी,
वो देश के सपूत हमारे,
माटी के लाल अनमोल थे,
देश हित में न्यौछावर,
करने को अपने प्राणों की
बाजी लगायी थी, वो माटी के लाल,
हमारे माँ के दूध का कर्ज,
उतार चले,उनके जज्बों को
शत-शत नमन, बुलंद इरादों
को सलाम है,हर एक भारतवासी को,
उनके कारनामों पर गुमान है ।
आज फैल रही भ्रष्टाचार,
नारियों की अस्मिता पर,
हो रहे प्रहार से पाने को निजाद,
माँ भारती पुकार रही,
फिर अपने दिवाने,आजादी के
परवाने ,उन माटी के लालों
का पथ निहार रही ।।
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“शहीदों” की “शहीदी”
हुए बहुत लोग शहीद मेरे देश को बचाने को,
पर उन “शहीदों” की “शहीदी” आज खुद शहीद सी लगती है।
देश में हो रहे हंगामो में खुद कही गुम सी लगती हैं।जिस दिन औरत-आदमी का सामान अधिकार हो जायेगा,
यकीन मानो उस दिन “शाहिदो” की “शाहीदी” को सलाम हो जायेगा।।।।जिस दिन निर्भया जैसी लडक़ी सरेआम बेआबरू होने से बच जायेगी,
उसी दिन मेरे देश की शाहिदो की शाहीदी अमर हो जायेगी।जब शाहिदो ने शाहीदी के वक़्त धर्म,जात-पात न देखा,
तो हम क्यों इन ढकोस्लो में पड़ते है।
आ बसंती चोले को काले रंग में रंगते है।।शहीद होने का मतलब बस प्राण देना नहीं होता,
अपने समाज देश को हर बुराई से आज़ाद करना होता है,तभी उनकी कुर्बानी “शहीदी” कहलायेगी,
उनके नाम और बलिदान को शीतिज पर लहरायेगी।।
-द्वारा
ज्योति -
आओ कर दे हम आजादी भगत सिंह के नाम |
अंग्रेज रूपी कंश हेतु वह तो कृष्ण कलेवर था ,
करतूश को भोजन माना फंशी को जेवर था ,
वतन के लिये डर न पाया जेल की काली रातो से,
उसका वर्णन करू मैं कैसे कलम की अपनी बातो से ,
दे दी हमें आजादी लेकर खुद पर वो अंजाम ,
आओ कर दे हम आजादी भगत सिंह के नाम | -

शहीद
जब जब भारत के इतिहास के पन्ने पलटे जायेंगे,
भगत सिंह,सुखदेव,राजगुरु के नाम भी लिए जायेंगे !
ये वो हैं जिन्होंने अंग्रेजों की ईंट से ईंट बजा दी थी,
भारत माँ के लिये अपने प्राणों की बाजी लगा दी थी !!
माह सितंबर पंजाब में एक वीर ने जन्म लिया था,
अंग्रेजों के अत्याचारों का बोझ उसने कम किया था !
अंग्रेजों के साथ इन्होंने खून की होली खेली थी,
भारत माता की जय हो ये ही उनकी तब बोली थी !!
सुखदेव,आजाद,राजगुरु का भी इनको साथ मिला,
इनके प्रयासों से ही भारत में एक नया कमल खिला !
ऐसे वीरों की मैं अब चलो फिर से कहानी सुनाता हूँ ,
बुझी हुई देशभक्ति की फिर मैं से लौ जलाता हूँ !!
शहीद दिवस पे चलो मिलके आज हम उन्हें याद करें,
जो पाके हमने खो दिया चलो अब उनका ध्यान करें !
ऐसे वीरों को मैं हरदम शत शत नमन करता हूँ ,
क्या है अब मेरे दिल में मैं उसको अब लिखता हूँ !!
जब भी जनम मिले मुझे भारत वतन मिले,
हो फूल भांति भांति को ऐसा चमन मिले !
इस मातृभूमि पर मेरा तन मन निसार हो,
मरने के बाद मुझको तिरंगा कफन मिले !!
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शहीद
जब जब भारत के इतिहास के पन्ने पलटे जायेंगे,
भगत सिंह,सुखदेव,राजगुरु के नाम भी लिए जायेंगे !
ये वो हैं जिन्होंने अंग्रेजों की ईंट से ईंट बजा दी थी,
भारत माँ के लिये अपने प्राणों की बाजी लगा दी थी !!
माह सितंबर पंजाब में एक वीर ने जन्म लिया था,
अंग्रेजों के अत्याचारों का बोझ उसने कम किया था !
अंग्रेजों के साथ इन्होंने खून की होली खेली थी,
भारत माता की जय हो ये ही उनकी तब बोली थी !!
सुखदेव,आजाद,राजगुरु का भी इनको साथ मिला,
इनके प्रयासों से ही भारत में एक नया कमल खिला !
ऐसे वीरों की मैं अब चलो फिर से कहानी सुनाता हूँ ,
बुझी हुई देशभक्ति की फिर मैं से लौ जलाता हूँ !!
शहीद दिवस पे चलो मिलके आज हम उन्हें याद करें,
जो पाके हमने खो दिया चलो अब उनका ध्यान करें !
ऐसे वीरों को मैं हरदम शत शत नमन करता हूँ ,
क्या है अब मेरे दिल में मैं उसको अब लिखता हूँ !!
जब भी जनम मिले मुझे भारत वतन मिले,
हो फूल भांति भांति को ऐसा चमन मिले !
इस मातृभूमि पर मेरा तन मन निसार हो,
मारने के बाद मुझको तिरंगा कफन मिले !! -
माँ के लाल
भगत सिंह, शिव राज गुरु, सुखदेव सभी बलिदान हुए,
इस धरती माँ की खातिर कितने ही अमर नाम हुए,
ब्रिटिश राज की साख मिटाने को एक जुट मिटटी के लाल हुए,
कभी सीने पर गोली खाकर कभी फांसी पर लटक काल के गाल हुए,
इंकलाब के नारों से भगवा रंग मिलकर लाल हुए,
तिरंगे को लहराने की चाहत में शहीद माँ के लाल हुए॥
राही (अंजाना) -

शहीदों की होली
“एक ये भी होली है एक वो भी होली थी जो शहीदों ने खेली थी, देश को आज़ाद कराने की ख़ातिर…मेरी कविता 23 मार्च पर शहीद दिवस के उपलक्ष्य में शहीदों को नमन करती है…..”
रंगों का गुबार धुआँ बन कर,
उठ रहा है मेरे सीने में…………….
वो रंग जो ‘आज़ादों’ ने भरा था,
आज़ादी की जंग में,
वो रंग जो निकला था आँखों से,
चिनगारी में,
वो रंग जिससे लाल हुई थी,
भारत माता,
इन्हीं रंगों का गुबार धुआँ बनकर,
उठ रहा है मेरे सीने में…………….
रंग जो उपजे थे, उबले थे, बिखरे थे,
आज़ादी का रंग पाने,
वो रंग जो शहीदों ने पहने थे,
सीना ताने,
उन केसरिया, लाल, सफ़ेद, और काले रंगों को,
रंगों के उस मौसम को,
मेरा सलाम…..
उन नामचीन ‘आज़ादों’, बेनामी किताबों,
उन वीरांगनाओं, उन ललनाओं,
थोड़ी सी उन सबलाओं, हज़ारों उन अबलाओं को,
मेरा सलाम……
बंटवारे में जो बंट गईं, भूखे पेट दुबक गईं,
कोड़े खाकर भी जो कराह न सकीं,
कुएँ में कूद कर भी जो समा न सकीं,
उन हज़ारों आत्माओं को,
मेरा सलाम……..
इतिहास के गर्त से उकेर कर,
सिली हुई तुरपाइयों से उधेड़ कर,
निकाली गई, हमें दिखाई गई,
1947 में आज़ादी के दीवानों की,
होली की उस उमंग को,
‘शहीदों की होली’ की उस कहानी को,
मेरा सलाम…………..
स्वरचित ‘मनीषा नेमा’
-

उनके सपनों का भारत
वज़न उठता नहीं
तुमसे दो मण भी
कहां गई शक्ति
तुम्हारे यौवन की
और कहां है अभिव्यक्ति
तुम्हारे मन की।
चलो ये वज़न तो
तुम भारी कह सकते हो
इससे इंकार भी कर दो
तो ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा
लेकिन तुम तो वो वज़न भी
उठाने को तैयार नहीं
जो होता है
देश के प्रति
कुछ प्रण का
और जो दायित्व है
तुम्हारे इस युवानपन का।
उन्होंने तो
अपना बलिदान देकर
तुम्हें ये भारत सोंपा
लेकिन तुमने
कितना योगदान देकर
देश के बारे में सोचा
सहो ये देशभक्ति का झोंका।
ये भारत
उनके सपनों का भारत
लगता ही नहीं
या फिर कहूँ
कि है ही नहीं।
उन्होने तो
अपने प्राणों को भी
देश के खातिर झोंका
लेकिन क्या तुम्हारे ज़मीर ने
तुम्हारा उत्तरदायित्व निभाने के लिए
तुम्हें कभी नहीं टोका
चलते हुए उन राहों पर
जिनकी मंज़िल वो तो नहीं
जो उन वीरों ने सोची थी
सच में ये भारत
उन वीरों के
सपनों का भारत
है ही नहीं।
काबिल हैं इस देश में अभी भी
काबलियत की भी कमी नहीं
लेकिन कर नहीं पा रहे सभी
अभिव्यक्ति अपनी असलियत की
जब असलियत अपनी
और अपने कर्तव्य की
सभी युवा जान जाएंगे
तो फिर
वो बनकर कारगर युवाशक्ति
इस देश का सितारा
और भी चमकाएंगे
और कभी न कभी तो
इस भारत को
उनके सपनों का भारत
बनाकर ही दिखाएंगे।
–कुमार बन्टी