12 Comments

  1. लक्ष्य पर फिर से बढ़ा पग, स्वपन को में कर दूं पूरा
    धीरे धीरे बढ़ते बढ़ते चांद पूरा हो गया…….
    बहुत ही ज़बरदस्त और शानदार कविता है सतीश जी । अपने लक्ष्य पर आगे बढ़ने का बहुत सुंदर भाव है।कविता की लयबद्ध शैली ने बहुत प्रभावित किया है ।मुझे तो आपकी सारी रचनाओं में ये वाली सबसे सुंदर लगी है ।आपकी इस कविता की शैली और अभिव्यक्ति के लिए आपकी कलम को प्रणाम, अभिवादन सर ।

    1. आपकी इस शानदार समीक्षा से मन में अतीव प्रसन्नता है। आपके द्वारा की गई समीक्षा प्रेरक और उत्साहवर्धक है। सादर अभिवादन।

  2. बहुत अद्भुत रचना चाचा जी 💐💐💐💐💐
    आपके अल्फाजों की चमक के सामने सब सादा लगा,
    आसमाँ पर चाँद पूरा था… मगर आधा लगा।

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